Tuesday, December 30, 2008

आपकी राह उन मोतियों से सजे

फिर नया वर्ष आकर खड़ा द्वार पर,
फिर अपेक्षित है शुभकामना मैं करूँ
मांग कर ईश से रंग आशीष के
आपके पंथ की अल्पना मे भरूँ
फिर दिवास्वप्न के फूल गुलदान में
भर रखूँ, आपकी भोर की मेज पर
न हो बाती, नहीं हो भले तेल भी,
कक्ष में दीप पर आपके मैं धरूँ

फिर ये आशा करूँ जो है विधि का लिखा
एक शुभकामना से बदलने लगे
खंडहरों सी पड़ी जो हुई ज़िन्दगी
ताजमहली इमारत में ढलने लगे
तार से वस्त्र के जो बिखरते हुए
तागे हैं, एक क्रम में बंधें वे सभी
झाड़ियों में करीलों की अटका दिवस
मोरपंखी बने और महकने लगे

गर ये संभव है तो मै हरइक कामना
जो किताबों में मिलती, पुन: कर रहा
कल्पना के क्षितिज पर उमड़ती हुई
रोशनी मे नया रंग हूँ भर रहा
आपको ज़िन्दगी का अभीप्शित मिले
आपने जिसका देखा कभी स्वप्न हो
आपकी राह उन मोतियों से सजे
भोर की दूब पर जो गगन धर रहा.

Friday, December 19, 2008

दूर का मसला

दूर का मसला घरों तक आ रहा है
बाढ़ का पानी सरों तक आ रहा है।

आग माना दूर है, लेकिन धुआं तो,
इन सुहाने मंज़रों तक आ रहा है।

लद चुके दिन चूड़ियों के,मेंहदियों के;
फावड़ा कोमल करों तक आ रहा है।

मंदिरों से हट के अब मुद्दा बहस का
जीविका के अवसरों तक आ रहा है।

इसने कुछ इतिहास से सीखा नहीं है;
एक प्यासा सागरों तक आ रहा है।

Wednesday, December 17, 2008

चित्र मावस का था, रंग भरते रहे

राहें ठोकर लगाती रहीं हर घड़ी
और हम हर कदम पर संभलते रहे
कट रही ज़िन्दगी लड़खड़ाते हुए
स्वप्न बनते संवरते बिगड़ते रहे

चाह अपनी हर इक टंग गई ताक पर
मन में वीरानगी मुस्कुराती रही
आस जो भी उगी भोर आकाश में
साँझ के साथ मातम मनाती रही
अधखुले हाथ कुछ भी पकड़ न सके
वक्त मुट्ठी से पल पल खिसकता रहा
शब्द के तार से जुड़ न पाया कभी
स्वर अधूरा गले में सिसकता रहा

कोई भी न मिला मौन जो सुन सके
सुर सभी होठ पर आ बिखरते रहे

जेठ गठजोड़ मधुबन के संग कर रहा
कोंपलें सब उमीदों की मुरझा गईं
टूट कर डाल से उड़ गये पात सी
आस्थायें हवाओं में छितरा गईं
देह चन्दन हुई, सर्प लिपटे रहे
मन के मरुथल में उगती रही प्यास भी
कल्पनाओं के सूने क्षितिज पर टंगा
पास आया न पल भर को मधुमास भी

हाथ में तूलिका बस लिये एक हम
चित्र मावस का था, रंग भरते रहे

भोर को पी गई इक किरण सूर्य की
साँझ दीपक बनी धार में बह गई
टिमटिमाते सितारों की परछाईयाँ
रात की ओढ़नी पर टँकी रह गईं
प्यास हिरना के बनकर भटकते सपन
नींद सो न सकी एक पल के लिये
अर्थ पाने की हम कोशिशें कर रहे
जो बुजुर्गों ने आशीष हमको दिये

मान्यताओं के घाटों पे काई जमी
हम कदम दर कदम बस फिसलते रहे

Friday, December 12, 2008

जब भी चाहा

जब भी चाहा तुमसे थोड़ी प्यार की बातें करूं

पास बैठूं दो घड़ी,श्रृंगार की बातें करूं।



वेदना चिरसंगिनी हठपूर्वक कहने लगी

आंसुओं की,आंसुओं की धार की बातें करूं।



देखता हूँ रुख ज़माने का तो ये कहता है मन

भूल कर आदर्श को व्यवहार की बातें करूं।



आप कहते हैं प्रगति के गीत गाओ गीतकार;

सत्य कहता है दुखी संसार की बातें करूं।



चाटुकारों के नगर में सत्य पर प्रतिबन्ध है।

किस लिए अभिव्यक्ति के अधिकार की बातें करूं।



इस किनारे प्यास है; और उस किनारे है जलन

क्यों न फिर तूफ़ान की मंझधार की बातें करूं.

Tuesday, December 9, 2008

लक्षण हैं चढ़ रही उमर के

संभल संभल जब उठते हैं पग, अमराई की राहगुजर पे
अरे रूपसि ! निश्चित मानो, लक्षण हैं चढ़ रही उमर के

धुंधली आकॄतियों के बिम्बों में मन उलझ उलझ जाता है
एक अधूरा छंद अधर पर पाहुन बन बन कर आता है
अभिलाषा की हर अँगड़ाई टूट टूट कर रह जाती है
निमिष मात्र भी एक बिन्दु पर ध्यान नहीं रुकने पाता है

हर इक सांझ लिये आती है बाँहों में सपने भर भर के
अरी वावली ! ध्यान रहे ये लक्षण हैं चढ़ रही उमर के

अनजाने ही खिंच आती हैं चेहरे पर रेखायें लाज की
गडमड होकर रह जाती हैं, बातें कल की और आज की
फूलों की पांखुर को करते, आमंत्रित पुस्तक के पन्ने
मन को करती हैं आलोड़ित ,बात रीत की औ; रिवाज की

मीठी मीठी बातें करने लगें रंग जब गुलमोहर के
सुनो रुपसि ! याद रहे, यह लक्षण हैं चढ़ रही उमर के

मन को भाने लगती हैं जब इतिहासों की प्रेम कथायें
चैती के आंगन में आकर सावन की मल्हारें गायें
पुरबाई के झोंके भर दें रोम रोम में जब शिंजिनियां
सात रंग पलकों की देहरी पर आकर अल्पना बनायें

आतुर हों जूड़े में सजने को जब फूल उतर अंबर के
रूपगर्विते ! मानो तुम ये लक्षण हैं चढ़ रही उमर के

Tuesday, December 2, 2008

अतीत के झरोखों से

मौन है स्वर, ह्रदय गूँगा, आँख में आँसू नहीं हैं
इक अपाहिज सी व्यथा का बोझ कांधे पे रखा है

ढाक के वे तीन पत्ते, जो सदा शाश्वत रहे हैं
आज फिर से सामने आये हैं मेरे खिलखिलाते
नीम की कच्ची निबोली पर मुलम्मा चाशनी का
उम्र सारी ये कटी है बस यूँही धोखे उठाते

तोड जी करते प्रयासों का, सदा उपलब्धियों के
हश्र क्या होगा किसी को ग्यात ये कब जो सका है

साँझ ढूंढे मोरपंखी बिम्ब दर्पण में निशा के
साथ चलना चाहती द्रुतगामिनी चलती हवा के
पर टिकी बैसाखियों पर एक जर्जत क्षीण काया
दो कदम भी बढ न पाती,ठोकरें खा लड्खडा के

भोर का पाथेय लेकर राह कोई सज न पाती
नीड में ही हर मुसाफ़िर हार कर बैठा थका है

Friday, November 28, 2008

वो मेरे बच्चों को

वो मेरे बच्चों को स्कूल ले के जाता था।
और उसका बेटा वहीं खोमचा लगाता था॥

उन्हें जो धूप से, बरसात से बचाता था ।
खुद उसके सर पे फ़क़त आसमाँ का छाता था।

भटक गया हूं जहां मैं –कभी उसी वन से,
सुना तो है कि कोई रास्ता भी जाता था॥

सियाह रात थी, और आँधियाँ भी थीं; लेकिन
उन्हीं हवाओं में एक दीप टिमटिमाता था ॥

उसे पड़ोसी बहुत नापसन्द करते थे।
वो रात में भी उजालों के गीत गाता था॥

Tuesday, November 25, 2008

यादों के दीपक जलते हैं

बिम्ब उलझ कर जब संध्या में, सूरज के संग संग ढलते हैं
जाने अनजाने तब मेरी यादों के दीपक जलते हैं

सिरहाने के तकिये में जब ओस कमल की खो जाती है
राह भटक कर कोई बदली, बिस्तर की छत पर छाती है
लोरी के सुर खिडकी की चौखट के बाहर अटके रहते
और रात की ज़ुल्फ़ें काली रह रह कर बिखरा जाती हैं


तब सपने आवारा होकर अम्बर में उडते रहते है
जाने अनजाने तब मेरी यादों के दीपक जलते हैं


पनघट की सूनी देहरी पर जब न उतरती गागर कोई

राह ढूँढती इक पगडन्डी रह जाती है पथ में खोई
सुधियों की अमराई में जब कोई बौर नहीं आ पाती
बरगद की फ़ुनगी पर बैठी बुलबुल गीत नहीं जब गाती


और हथेली में किस्मत के लेखे जब बनते मिटते हैं
जाने अनजाने तब मेरी यादों के दीपक जलते हैं

इतिहासों के पन्नों में से चित्र निकल जब कोई आता
रिश्तों की कोरी चूनर से जुड जाता है कोई नाता
पुरबाई जब सावन को ले भुजपाशों में गीत सुनाये
रजनीगन्धा की खुशबू जब दबे पाँव कमरे तक आये

और क्षितिज पर घिरे कुहासे में जब इन्द्रधनुष दिखते हैं
जाने अनजाने तब मेरी यादों के दीपक जलते हैं


(२००३)

Friday, November 21, 2008

कह गया था

कह गया था, मगर नहीं आया;
वो कभी लौट कर नहीं आया।

क़ाफिले में तमाम लोग थे पर,
बस वही हमसफ़र नहीं आया।

रेल जीवन की ‘टर्मिनस’ पहुंची;
किंतु मेरा शहर नहीं आया।

ऐसा क्यों लगता है कि जैसे वो,
आ तो सकता था, पर नहीं आया।

एक मेरी बिसात क्या, सुख तो
जाने कितनों के घर नहीं आया।

Tuesday, November 18, 2008

कुछ यहाँ पर हो गया है

है नहीं बदलाव कोई, सूरतें वे ही पुरानी
पर न जाने लग रहा क्यों कुछ यहाँ पर हो गया है

चाँदनी वाले क्षितिज से
देखिये नजरें फिराकर
प्रीति के इतिहास की
गौरव कथायें गुनगुनाकर
यामिनी-गंधा सुमन की
गंध में डूबी हुई सी
एक दुल्हन सी, प्रतीक्षा
में खड़ी देखें प्रतीची

रक्तवर्णी चूनरी से झील का श्रन्गार कर के
देखिये सूरज अचानक आज फिर से खो गया है

पनघटों पर गागरों की
पंक्तियाँ अनगिन बनाकर
खेत की हर मेंड़ पर
आषाढ़ की मल्हार गाकर
चातकों की प्यास के हर
सुप्त पल को सींचता सा
धुंध में डूबे गगन में
एक रेखा खींचता सा

डाल भ्रम में सावनों के गांव का हर इक मुसाफ़िर
एक बादल का कोई टुकड़ा यहाँ फिर रो गया है

Friday, November 14, 2008

कहां गए

कहां गए वो लड़कपन के ख़्वाब, मत पूछो;
कड़ा सवाल है, इसका जवाब मत पूछो।

अकेले मेरे दुखों की कहानियां छोड़ो;
समंदरों में लहर का हिसाब मत पूछो।

मुबारकों की रवायत है कामयाबी पर,
कि कौन कैसे हुआ कामयाब, मत पूछो।

जो हर कदम पे मेरे साथ है, वो तनहाई
मेरा नसीब है या इंतख़ाब, मत पूछो।

अमावसों में चराग़ों का इंतज़ाम करो;
कहां फ़रार हुआ आफ़ताब मत पूछो।

Tuesday, November 11, 2008

अतीत के झरोखों से

कौन झंकारता तार मन के मेरे
उंगलियाँ सारी मुझको मिलीं व्यस्त ही

किस तरह गीत अपना सुनाऊँ तुम्हें
मन की वीणा के तारों में कम्पन नहीं
खुश्बूओं में डुबो शब्द बिखराये तो
किन्तु महका कहीं कोइं चन्दन नहीं
मैने कितना अलंकॄत किया शब्द को
किन्तु मिल न सका अर्थ कोइं उन्हें
हो गया व्यर्थ श्रॄंगार सारा प्रिये
छू न पाया मेरा प्रस्फुटित स्वर तुम्हें

ताकता मैं रहा नित्य प्राची मगर
सूर्य उगने से पहले हुआ अस्त ही

अर्थ को खोजते शब्द खुद खो गया
जो था शाश्वत कभी,आज नश्वर हुआ
भावनायें मेरी खटखटाती रहीं द्वार
पर हर ह्रदय आज पत्थर हुआ
देखते देखते मेरी सम्प्रेषणा
लड़ती अवरोध से छिन्न हो रह गयी
जो भी संचित थी पूँजी मेरी साँस की
आह की आँधियों में सिमट बह गयी

रोज पलकों पे अपनी सजाता रहा,
पर महल स्वप्न का हर मिला ध्वस्त ही

स्वर सभी गूँजते शंख के खो गये
आरती मन्दिरों से परे रह गयी
रास्ता भूल कर खो गइं है घटा
बात ये इक हवा पतझरी कह गइं
साँझ के दीप में शेष बाती नहीं
रोशनी क्षीण हो टिमटिमाती रही
जो न निकली किसी साज के तार से
एक आवाज़ सी सिर्फ़ आती रही

गणना तारों नक्षत्रों की जब भी करी
हर सितारा मिला राहू श्ंर ग्रस्त ही

कौन झन्कारता तार मन के मेरे
उंगलियाँ सारी मुझको मिलीं व्यस्त ही

Friday, November 7, 2008

चिड़िया के बच्चे

चिड़िया के बच्चों ने पर तौले ;
और उड़ चले।
नन्हें-नन्हें फड़फड़ाते पर
कोमल और सुकुमार.

कुछ तेज़ी से उड़े;
आगे निकले;और बनाया
एक नया नीड़;
फिर से लिखने को-
वही पुरातन चिर कथा.

कुछ के पंख
इतने सशक्त न थे.
आंधी-वर्षा से जूझते
वे जा गिरे धरती पर-
और ग्रास बने –
व्यालों बिलावों के.

कुछ करते रहे जतन ,
नीड़ के निर्माण का.
रहे खोजते कोई सशक्त डाल
छाया और आश्रय को.
कुछ को मिली;
कुछ को नहीं मिली.

सबका था अपना-अपना
जीवन-समर;
अपने-अपने नीड़,
अपनी-अपनी डाल;
अपने-अपने व्याल.

पर एक तथ्य
उन सबकी गाथा में साझा था.
उनमें से कोई भी
पुराने नीड़ पर नहीं लौटा.

Tuesday, November 4, 2008

खो गये चाँदनी रात में

चाँदनी रात के हमसफ़र खो गये चाँदनी रात में
बात करते हुए रह गये, क्या हुआ बात ही बात में

ज़िन्दगी भी तमाशाई है, हम रहे सोचते सिर्फ़ हम
देखती एक मेला रही, हाथ अपना दिये हाथ में

जिनक दावा था वो भूल कर भी न लौटेंगे इस राह पर
याद आई हमारी लगा आज फिर उनको बरसात में

जब सुबह के दिये बुझ गये, और दिन का सफ़र चुक गया
सांझ तन्हाईयां दे गई, उस लम्हे हमको सौगात में

तालिबे इल्म जो कह गये वो न आया समझ में हमें
अपनी तालीम का सिलसिला है बंधा सिर्फ़ जज़्बात में

आइने हैं शिकन दर शिकन, और टूटे मुजस्सम सभी
एक चेहरा सलामत मगर, आज तक अपने ख्यालात में

मेरे अशआर में है निहाँ जो उसे मैं भला क्या कहूँ
नींद में जाग में भी वही, है वही ज्ञात अज्ञात में

ये कलांमे सुखन का हुनर पास आके रुका ही नहीं
एक पाला हुआ है भरम, कुच हुनर है मेरे हाथ में

ख्वाहिशे-दाद तो है नहीं, दिल में हसरत मगर एक है
कर सकूँ मैं भी इरशाद कुछ एक दिन आपके साथ में

Saturday, November 1, 2008

मुद्दतों पहले

मुद्दतों पहले जहां छोड़ लड़कपन आए
बारहा याद वे दालान, वे आँगन आए।

रास्ते में किसी बरगद का तो साया न मिला;
हाँ! मगर इसमें बबूलों के कई वन आए।

घर नगर छोड़ के जिस रोज़ से वनवास लिया
हमसे मिलने कई तुलसी, कई रावन आए।

रहे गुमनाम हर इक बज़्म ओ बाज़ार में हम
जैसे नाबीना शहर में कोई दरपन आए।

कट गई उम्र यूं ही आँख मिचौनी में नदीम
दुःख के बैसाख कभी दर्द के सावन आए।

Tuesday, October 28, 2008

दीप पर्व

दीप का यह पर्व मन के द्वार पर आ रोशनी पल पल जगाये
और पथ में कोई भी अवरोध आने से प्रथम अवसान पाये
स्वप्न जो संवरा नयन में, शिल्प में ढल सामने आ मुस्कुराये
जो ह्रदय से उठ रही हैं कीजिये स्वीकार मंगल कामनायें

सादर,

राकेश खंडेलवाल

Friday, October 24, 2008

घने बनों में

घने बनों में शहर का पता कहीं न मिला;
भरी थी नाव, मगर नाख़ुदा कहीं न मिला।

लिखी थी किसने ये उलझी सी ज़िन्दगी की ग़ज़ल!
कोई रदीफ़, कोई काफ़िया कहीं न मिला।

महँत बैठे थे काबिज़ सभी शिवालों में;
बहुत पुकारा मगर देवता कहीं न मिला।

सुना तो था कि इसी राह से वो गुज़रे थे,
तलाश करते रहे; नक्श-ए-पा कहीं न मिला।

सफ़र हयात का तनहा ही काट आये नदीम;
लगे जो अपना सा वो काफ़िला कहीं न मिला।

Tuesday, October 21, 2008

मौन की अपराधिनी

शब्द की अँगनाईयों में गीत अब भटके हुए हैं
अलगनी पर नैन की बस अश्रु ही अटके हुए हैं

जानता हूँ मौन की अपराधिनी तो रागिनी है
जो न उसके बंधनों को गूँज देकर खोल पाई
और पग पत्थर बने, यह पायलों को श्रेय जाता
जो न पल भर थाम उनको नॄत्य में थी झनझनाई
अनलिखे हर गीत का दायित्व ढोती लेखनी ये
बाँझ होकर दे न पाई ज़िन्दगी कोई गज़ल को
पॄष्ठ जिम्मेदार हैं इतिहास के, पंचांग के भी
जोड़ पाये न गुजरते आज से आगत सकल को

किन्तु है आक्षेप का बोझा उठाये कौन बोलो
पोटली को सब पथिक अब राह पर पटके हुए हैं

क्या विदित तुमको अँधेरा ही नहीं दोषी तिमिर का
दीप की लौ भी ,उसे जो रोशनी दे न सकी है
हर लहर जिसने डुबोयी नाव, है सहभागिनी उस
एक ही पतवार की ,धारा नहीं जो खे सकी है
कूचियों के साथ शामिल व्यूह में हैं रंग सारे
जो क्षितिज के कैनवस को चित्र कोई दे न पाये
पुष्प की अक्षम्यता का ज़िक्र करना है जरूरी
प्रिय अधर के पाटलों पर जो न आकर मुस्कुराये

पांव जिनके पनघटों की राह पर थिरके हमेशा
आज उनके पथ तॄषाऒ के सघन तट के हुए हैं

Friday, October 17, 2008

बादल,तितली, धूप

बादल, तितली, धूप, घास, पुरवाई में
किसका चेहरा है इनकी रानाई में?

तुम तो कहते थे हर रिश्ता टूट चुका!
फ़िर क्यों रोए रातों को तन्हाई में?

वो साहिल की रेत देख कर लौट गया;
काश! उतरता दरिया की गहराई में.

पत्थर इतने आए लहूलुहान हुई;
ज़ख्मी कोयल क्या कूके अमराई में.

दिल और आँखें दोनों ही भर आते हैं
किसने इतना दर्द भरा शहनाई में?

Tuesday, October 14, 2008

ओस की बून्द ने

हर दिवस हो गया हीरकनियों जड़ा, मोरपंखी हुई मेरी हर शाम है
ओस की बून्द ने फूल की पंखुड़ी पर लिखा धूप से जब तेरा नाम है

रात भर थी टपकती हुई चाँदनी को पिरोती रही भोर की धूप में
गंध को घोल कर स्याहियां फिर बना थरथराते अधर की कलम में भरा
रोशनी की पिघलती हुई इक किरण पांव को चूमने के लिये बिछ गई
जब बही धूप ने था कलम से निकल नाम चुम्बन से इक पंखुड़ी पर जड़ा

एक पल वह सपन का शिलालेख बन, नैन के पाटलों पर सुबह शाम है
ओस की बून्द ने फूल की पंखुड़ी पर लिखा धूप से जब तेरा नाम है

झील में से उठी इक उनींदी लहर राग नूतन अचानक लगी छेड़ने
सात रंगो भरा भोर का बिम्ब तब पंखुड़ी बन गई जिस निमिष आईना
नरगिसी हो क्षितिज लीन होने लगा सूर्य के चक्र की रुक गई फिर गति
जगमगाती हुई दीप्ति से जो घिरा नाम उठ कर खड़ा हो गया आँगना

अंत-आरंभ-सुध-बुध बिसर कर गये नाम के पास ये मेरा अनुमान है
ओस की बून्द ने फूल की पंखुड़ी पर लिखा धूप से जब तेरा नाम है

तारकों की सघन छांह में थे उगे कल्पना के हठीले निमिष रात भर
एक मुट्ठी हवा, गुनगुनाती रही बाँसुरी पे मचलती हुई रागिनी
वक्त खाकों को आकार करता रहा चाँदनी में भिगो, बदलियां कात कर
और प्राची की उंगली पकड़ थी खड़ी तूलिका आतुरा और उन्मादिनी

स्वर्ण का एक प्रासाद जो बन गया, क्यारियों में वही पांचवा धाम है
ओस की बून्द ने पंखुड़ी पर लिखा, धूप से जब प्रिये ये तेरा नाम है

Saturday, October 11, 2008

बेवतन फ़कीरों से

बेवतन फ़कीरों से पूछना ठिकाना क्या?
इनको तो भटकना है, इनसे दोस्ताना क्या?

दर्द कह के क्या कीजे, दर्द सबकी दौलत है;
दर्द सब समझते हैं दर्द का सुनाना क्या?

ख़ामशी के सहरा में गुफ़्तगू पे पहरे हैं;
फिर सवाल क्या करना,पूछना बताना क्या?

दर्द तो मुसलसल है, इसमें कब तलक रोएं!
हर ख़ुशी को जाना है, इसमें मुस्कराना क्या?

तुम तो जानते थे सब;तुमसे कह के क्या करते!
ग़ैर ग़ैर ही तो था; ग़ैर को बताना क्या?

Tuesday, October 7, 2008

ओ प्रवासी

ओ प्रवासी

उग रहे आकार अम्बर में मरुस्थल के भ्रमों से
कल्पना की हर छुअन, पर हो गई रह कर हवा सी
कब तलक यों पीर की अंगनाईयों में कसमसाता
दूर हो परिवेश से अपने रहेगा ? ओ प्रवासी

ज़िन्दगी की इस चकई का खींचता है कौन धागा
कौन दे सन्देस छत पर भेजता है रोज कागा
कौन सी कठपुतलियों के हाथ की रेखा बना है
उलझनों में और उलझा जा रहा है मन अभागा

साध उलझे केश सी पगडंडियों में छटपटाती
मिल सके छाई अमावस को किसी दिन पूर्णमासी

उंगलियों को कौन थामे ही बिना देता दिशायें
कौन कहता है घटित जो है करे वह मंत्रणायें
संकुचित कर दायरों में दॄष्टि को बन्दी बना कर
कौन कहता है क्षितिज के पार हैं संभावनायें

घेरती हैं एक ऊहापोह में सुईयां घड़ी की
क्या भरेगी आंजुरि में आस की चुटकी जरा सी

धार के प्रतिकूल जाती नाव पर नाविक अकेला
थक रहा है बाऊलों के गीत को दे रोज हेला
चाहता है छोड़ना पतवार पर घेरे विवशता
फिर थमाता हाथ में चप्पू प्लावित कोई रेला

चक्र में आरोह के अवरोह के आधार खोकर
चल रही है, सांस पल पल पर हुई है अनमनासी

खुल रही पुस्तक दिवस की पॄष्ठ रहते किन्तु कोरे
संचयों को शब्द दें, पहले उड़ा लेते झकोरे
सांझ की पठनीयता के भाग में बस शून्य रहता
और कहती चल पुन: तू आस्था अपनी संजो रे
पौष की चौथी निशा में घिर रहे गहरे कुहासे
की घनेरी चादरों में कामना जाती समा सी

कट चुकी हैं जो पतंगें, कौन उनकी डोर थामे
स्वप्न होवे स्नात कोई भोर की धुंधली विभा में
आगतों के प्रश्न का उत्तर, विगत ही सौंप जाये
ज्योत्सना उगती रहे, हर बार की घिरती अमा में

आस बोती बीज, यद्दपि जानती उनकी नियति है
उग चुके दिन के दिये की बुझ रही धूमिल शिखा सी

Tuesday, September 30, 2008

दवा-ए-दर्द-ए-दिल

दवा-ए-दर्द-ए-दिल के नाम पर अब ये भी कर जायें;
किसी के दुख में शामिल हों,किसी मुफ़लिस के घर जायें।

ये शेख़-ओ-बिरहमन का दौर है; इसमें यही होगा
कि मस्जिद और शिवालों की वजह से घर बिखर जायें।

रहे हम अपनी हद में सब्र से ,तो क्या हुआ हासिल?
चलो अब ये भी कर देखें; चलो हद से गुज़र जायें।

ये शंकर के मुरीदों की कतारें काँवरों वाली,
कभी रोटी की ख़ातिर भी तो सड़कों पर उतर जायें।

इधर मंदिर, उधर मस्जिद; इधर ज़िन्दाँ उधर सूली,
ख़िरदमंदों की बस्ती में जुनूँ वाले किधर जायें ।

प्रिये अधर से तुमने अपने

प्रिये अधर से तुमने अपने जब से किये अधर पर मेरे
हस्ताक्षर, तब से सपनों की बगिया और निखर आई है

आतुर हुई कामना भर ले यष्टि कमल को भुजपाशों में
आकाँक्षायें हैं सांसों की घुलें महक वाली सांसों में
नयनों की पुतली बन रांझा,चित्र हीर के बना रही है
नये रंग में नये रूप के मिले न जैसे इतिहासों में

देह तुम्हारी छूकर आई पुरबाई ने जब से आकर
मुझे छुआ है लगा धरा पर अलकापुरी उतर आई है

लगी जागने भोर रूप की उजली धूप बाँह में लेकर
निशा संवरने लगी घटाओं से लहराते कुन्तल छूकर
नींदों वाली डोर थाम कर लगे झूलने झूला तारे
महकीं डगर, और अलगोजे लगे गूँजने चहुंदिशि भू पर

द्वार तुम्हारे से आ मलयज मेरी गलियों से जब गुजरी
मुझको लगा तुम्हारे नूतन संदेसे लेकर आई है

हुए तिरोहित एक निमिष में मन के मेरे संशय सारे
रातों में आ लगे जलाने दीपक पूनम के उजियारे
नदिया की लहरों सी पल पल लगीं उमड़ने मधुर उमंगें
एक तुम्हारी छवि रहती है बस नजरों में सांझ सकारे

स्वर से उपजी सरगम ने आ जब से छुआ गीत इक मेरा
लगा मुझे मेरे शब्दों में वीणा स्वयं उतर आई है

Sunday, September 28, 2008

अबकी बार

अबकी बार दिवाली में जब घर आएँगे मेरे पापा
खील, मिठाई, चप्पल, सब लेकर आएँगे मेरे पापा।

दादी का टूटा चश्मा और फटा हुआ चुन्नू का जूता,
दोनों की एक साथ मरम्मत करवाएँगे मेरे पापा।

अम्मा की धोती तो अभी नई है; होली पर आई थी;
उसको तो बस बातों में ही टरकाएंगे मेरे पापा।

जिज्जी के चेहरे की छोड़ो, उसकी आंखें तक पीली हैं;
उसका भी इलाज मंतर से करवाएँगे मेरे पापा।

बड़की हुई सयानी, उसकी शादी का क्या सोच रहे हो?
दादी पूछेंगी; और उनसे कतराएंगे मेरे पापा।

बौहरे जी के अभी सात सौ रुपये देने को बाकी हैं;
अम्मा याद दिलाएगी और हकलाएंगे मेरे पापा।

Saturday, September 27, 2008

डॉ अमर ज्योति का इस ब्लाग पर सह लेखक रूप में स्वागत है !

नाम:-अमर ज्योति "नदीम" M।A।(Eng।),M.A.(Hindi),Ph.D(English)(आगरा विश्वविद्यालय) व्यवसाय:- विभिन्न स्तरों पर अध्यापन के उपरांत ग्रामीण बैंकमें अधिकारी। फ़िलहाल एक बड़ी सड़क दुर्घटना के बाद लंबे समय से बिस्तर पर।रचनायें:- अधिकतर ग़ज़लें, कुछ गीत, कुछ अतुकांत कवितायें, कुछ लेख, फ़िट्ज़्जेरल्ड की रुबाइयात उमर ख़ैय्याम की कई रुबाइयों का हिंदी अनुवाद, एक खण्डकाव्य…।

आधुनिक लेखकों पर व्यंग्य करतीं ये लाइनें, राजा लिख याद दिलातीं हैं, डॉ अमर ज्योति की ! इन पंक्तियों को पढ़कर एक शब्दचित्र खिंच जाता है जिसमें एक लेखक को, लिखने का प्रयत्न करते देख, अमर कह रहें हैं.... तेरे पास लिखने के लिए और क्या है ? वही पुरानी राजा रानी की कहानी लिख ..ठहरे हुए पानी को तूफानी लिख, और जब देश में खून बहाया जा रहा हो तो उसमें भी रस घोल के कविता लिख ...

उनकी अधिकतर कवितायें कमजोरों और जीवन को ढोते हुए लोगों का प्रतिनिधित्व करती है ! उनकी हर ग़ज़ल, दर्द में तडपती हुई जिंदगियों की, हकीक़त दिखाती नज़र आती है !

उसने कभी भी पीर पराई नहीं सुनी कितना भला किया कि बुराई नहीं सुनी ...

सुबह-सवेरे एक गाँव की गरीब विधवा रज्जो की अम्मा की चिंता का जीवंत मार्मिक उदाहरण है... जिसे बार बार पढने का मन करता है ...

राम के मंदिर पर लिखते हुए अमर को अपने देश में कप प्लेट धोते लव कुश याद आ रहे हैं ! इनका पूछना है कि "रख सकेंगे क्या अंगूठे को बचा कर एकलव्य;रामजी के राज में शंबूक जी पायेंगे क्या!"

एक और बानगी देखिये- कि कुछ लोगों को शायर और कवियों के लिए पसंदीदा मौसम सावन और बदली छाये माहौल से दहशत होती है, बदली के छाने से .....यह भी जीवन है ! कितने लोग इनके बारे में सोचते हैं ?

डॉ अमर ज्योति random rumblings की रचना को एक बार पढ़ कर मन नही भरता ! हर रचना एक वास्तविक चित्रण करती है एक सच्चाई का जिसको हम आम जीवन में नज़रन्दाज़ करते हैं ! विनम्रता की हालत यह है, अपने परिचय में एक पूरी लाइन भी नही लिखी ! जनाब इंग्लिश साहित्य में Ph.D. हैं, और सेवा हिन्दी की कर रहे हैं ! डॉ अमर ज्योति जैसे स्वच्छ लेखक हिन्दी जगत की आंख में गुलाब जल के समान हैं जो बेहद शीतलता देते हैं !

Thursday, September 25, 2008

अंतिम गीत लिखे जाता हूँ |

विदित नहीं लेखनी उंगलियों का कल साथ निभाये कितना
इसीलिये मैं आज बरस का अंतिम गीत लिखे जाता हूँ

चुकते हुए दिनों के संग संग
आज भावनायें भी चुक लीं
ढलते हुए दिवस की हर इक
रश्मि, चिरागों जैसे बुझ ली
लगी टिमटिमाने दीपक की
लौ रह रह कर उठते गिरते
और भाव की जो अँगड़ाई थी,
उठने से पहले रुक ली

पता नहीं कल नींद नैन के कितनी देर रहे आँगन में
इसीलिये बस एक स्वप्न आँखों में और बुने जाता हूँ

लगता नहीं नीड़ तक पहुँचें,
क्षमता शेष बची पांवों में
चौपालें सारी निर्जन हैं
अब इन उजड़ चुके गांवों में
टूटे हुए पंख की सीमा
में सिमट पातीं परवाज़ें
घुली हुई है परछाईं ,
नंगे करील की अब छांहों में

पता नहीं कल नीड़ पंथ को दे पाथेय नहीं अथवा दे
इसीलिये मैं आज राह का अंतिम मील चले जाता हूँ

गीतों का यह सफ़र आज तक
हुआ, कहाँ निश्चित कल भी हो
धुला हुआ है व्योम आज जो,
क्या संभव है यह कल भी हो
सुधि के दर्पण में दरारें पड़ें,
कौन यह कह सकता है ?
जितना है विस्तार ह्रदय का आज,

भला उतना कल भी हो ?

पता नहीं कल धूप, गगन की चादर को कितना उजियारे
इसीलिये मैं आज चाँद को करके दीप धरे जाता हूँ

है सभी कुछ वही

एक दीपक वही जो कि जलते हुए
मेरे गीतों में करता रहा रोशनी
एक चन्दा वही, रात के खेत में
बीज बो कर उगाता रहा चाँदनी
एक पुरबा वही, मुस्कुराते हुए
जो कि फूलों का श्रन्गार करती रही
एक बुलबुल वही डाल पर बैठ जो
सरगमों में नये राग भरती रही

भोर भी है वही, औ वही साँझ है
सिर्फ़, लगता है मैं ही बदलने लगा

जो संदेसा सुबह ने था आके दिया
आवरण था नया, बात थी पर वही
हैं वही चंद उलझे हुए फ़लसफ़े
है कहानी वही जो रही अनकही
है वही धूप गुडमुड सी लटकी हुई
अलगनी के अकेले उसी छोर पर
है वही एक खामोश पल वक्त का
मुँह छुपाता, गली के खडा मोड पर

मंज़िलें भी वही, राह भी है वही
सिर्फ़ निश्चय सफ़र का बदलने लगा

है धुआँसा धुआँसा वही आँगना
वो ही कुहरे में लिपटा हुआ गाँव है
वो ही साकी, वही मयकदा है, वही
लडखडाते, सँभलते हुए पाँव हैं
वो ही दहलीज आतुर बिछाये नयन
आस पग चुम्बनों की सजाये हुए
और यायावरी एक जोगी वही
धूनी पीपल के नीचे रमाये हुए

रंग भी हैं वही, कैनवस भी वही
तूलिका का ही तेवर बदलने लगा

शब्द चितेरे राकेश खंडेलवाल का "कुछ ग़ज़ल कुछ गीत" पर स्वागत हैं !


ब्लॉग जगत में फैले वैमनस्य और नफरत के जहर से दुखी होकर जब मैंने " वे नफरत बाँटें इस जग में हम प्यार लुटाने बैठे हैं ! !" पोस्ट लिखी समय मेरी इस रचना और संवेदना को ब्लॉग जगत के तमाम सम्मानित लेखकों ने आकर जो सम्मान दिया उससे मैं बेहद अभिभूत हुआ, राकेश खंडेलवाल ने जिस अपनत्व से अपनी प्रतिक्रिया और हौसला दिया वह एक नया उदाहरण होना चाहिए ब्लाग जगत के लिए ! मैं यह देख कर भौचक्का रह गया कि उनकी प्रतिक्रिया के बिना यह ख़त अधूरा था जिसे राकेश जी ने आकर पूरा किया !

...वे शंकित, कुंठित मन लेकर,
कुछ पत्थर हम पर फ़ेंक गए
हम समझ नही पाए, हमको
क्यों मारा ? इस बेदर्दी से ,
हम चोटें लेकर भी दिल पर, अरमान लगाये बैठे हैं !

......क्या शिकवा है क्या हुआ तुम्हे
क्यों आँख पे पट्टी बाँध रखी,
क्यों नफरत लेकर, तुम दिल में
रिश्ते, परिभाषित करती हो,
हम पुरूष ह्रदय, सम्मान सहित, कुछ याद दिलाने बैठे हैं....

राकेश जी ने इस ख़त को कुछ इस तरह पूरा किया ...

"जब भी कुछ फ़ूटा अधरों से
तब तब ही उंगली उठी यहाँ
जो भाव शब्द के परे रहे, वे
कभी किसी को दिखे कहाँ
यह वाद नहीं प्रतिवाद नहीं
मन की उठती धारायें हैं,
ले जाये नाव दूसरे तट, हम पाल चढ़ाये बैठे हैं !"

अद्वितीय शब्द संयोजन के धनी इस विनम्र महारथी ने " कुछ ग़ज़ल कुछ गीत " पर सह लेखक बन कर जो सम्मान दिया है हम डॉ अमर ज्योति और सतीश सक्सेना उनके आभारी हैं !

Thursday, August 28, 2008

श्रद्धा जी की कलम से निकली एक भीगी ग़ज़ल !

साधारण गीत , गज़लों से अलग इस ग़ज़ल में कुछ ऐसे भावः तथा दर्द है, जो श्रद्धा जी के प्रति अनायास ही एक श्रद्धा जगा देता है ! आपके सामने पेश है उनकी एक ग़ज़ल ....
( साभार साझा सरोकार से "आज़ादी पर श्रद्धा की बानगी" )


मौसम बदला, रुत बदली है, ऐसे नही दिलशाद हुए
हिंदू - मुस्लिम एक हुए जब, तब जाकर आज़ाद हुए
कितने अल्हड़ सपने थे जो दॉर–ए- सहर में टूट गये
कितने हँसमुख चेहरे रोए, कितने घर बर्बाद हुए
नहीं थी कोई जाति पाती, न ही दिलों में बँटवारा
हिंदू मुस्लिम, सिख, ईसाई, धरम अभी ईजाद हुए
कुर्बानी शामिल उनकी भी, क्यूँ आज पराए कहलाए
कालिख इक चेहरे की "क़ौम" पे, हम इतने जल्लाद हुए
हाथ बढ़ाओ , गले लगाओ, भेद भाव अब जाने दो
नमन हमारा हो उनको, जो भारत की बुनियाद हुए

- श्रद्धा जैन
-http://bheegigazal.blogspot.com/
-http://saajha-sarokaar.blogspot.com/

Sunday, August 17, 2008

अमरज्योति की एक कविता लेखकों के प्रति !

अमर की लिखी निम्न कविता " राजा लिख " मेरी सर्वाधिक पसंद की गयी कविताओं में से एक है ! यह कविता आधुनिक गीतकार, कवियों तथा लेखक मठाधीशों पर एक तीखा व्यंग्य है ! हम आजकल क्या लिखें ...क्या लिख रहे हैं ॥जो कुछ भी लिखते हैं अपना फायदा देख कर लिखते हैं ! लेख़क समाज पर किए गए तीखे व्यंग्य के लिए आभार सहित यह कविता यहाँ प्रकाशित कर रहा हूँ !

राजा लिख और रानी लिख।
फिर से वही कहानी लिख॥
बैठ किनांरे लहरें गिन।
दरिया को तूफ़ानी लिख॥

गोलीबारी में रस घोल।
रिमझिम बरसा पानी लिख॥
राम-राज के गीत सुना।
हिटलर की क़ुरबानी लिख॥

राजा को नंगा मत बोल।
परजा ही बौरानी लिख॥
फ़िरदौसी के रस्ते चल।
मत कबीर की बानी लिख॥

random rumblings से साभार !

Tuesday, July 29, 2008

खतरे में इस्लाम नहीं !

शहरोज़ के ब्लाग ( Hamzabaan हमज़बान )पर हबीब जालिब द्वारा लिखित ख़तरे में इस्लाम नहीं यह नज़्म मेरी पसंद की सबसे खुबसूरत रचनाओं में से एक, यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ ! आज जो लोग यह नारा बुलंद करते हैं की इस्लाम खतरे में है, उनको इसमें बड़ी मजबूती के साथ जवाब दिया है !

ख़तरे में इस्लाम नहीं

खतरा है ज़र्दारों को
गिरती हुई दीवारों को
सदियों के बीमारों को
ख़तरे में इस्लाम नहीं

सारी ज़मीं को घेरे हुए
हैंआख़िर चंद घराने क्यों
नाम नबी का लेनेवाले
उल्फत से बेगाने क्यों

खतरा है खूंख्वारों को
रंग-बिरंगी कारों को
अमरीका के प्यारों को
ख़तरे में इस्लाम नहीं

आज हमारे नारों से
लर्जां है बपा एवानों में
बिक न सकेगें हसरतो-अरमाँ
ऊँची सजी दुकानों में

खतरा है बटमारों को
मगरिब के बाज़ारों को
चोरों को,मक्कारों को
ख़तरे में इस्लाम नहीं

अमन का परचम लेकर उट्ठो
हर इंसान से प्यार करो
अपना तो मन्शूर है जालिब
सारे जहाँ से प्यार करो

खतरा है दरबारों को
शाहों के गम्ख्वारों को
नव्वाबों,गद्दारों को
ख़तरे में इस्लाम नहीं
( आभार सहित Hamzabaan से )

(शबाब=जवानी, ईदे-कुर्बां=कुर्बानी का दिन , सवाब=पुन्य ,ज़र्दारों=पूंजीपतियों,नबी=पैगम्बर मोहम्मद,एवानों=संसद,मगरिब=पश्चिम,मन्शूर=घोषणा-पत्रगम्ख्वारों=हमदर्दों)

Sunday, July 20, 2008

शकील बदायूँनी !

"ताबंदा रहे ईमान शकील इसको ही इबादत कहते हैं ,
सजदे के लिए कोई कैद नही, काबे में हो या बुतखाने में "

Friday, July 18, 2008

गुमनाम शायरों से !

दिल गम से जल रहा है जले , पर धुआं न हो
मुश्किल है इसके बाद कोई ,इम्तिहाँन हो !
***************************************
हजारों ख्वाहिशें ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले ,
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले
*************************************** " ग़ालिब"
दिल अभी पूरी तरह टूटा नहीं
दोस्तों की मेहरबानी चाहिए
***************************************
आप खून ऐ इश्क का इल्जाम अपने सर न लें ,
आपका दामन सलामत, अपने कातिल हम सही

Tuesday, July 15, 2008

मेरा पहला सेर !


( चित्र सस्ता शेर से साभार )

अपनी खिड़की वो झांके
अपनी खिड़की से हम झांके
लगा दो आग , खिड़की में
न हम झांके न वो झांके !

Sunday, July 6, 2008

कुछ मशहूर शायरों से !

दिल खुश हुआ मस्जिदे वीरान देखकर
मेरी तरह खुदा का भी खाना ख़राब है !

Monday, June 30, 2008

कुछ मशहूर शायरों से !

इंशा अब इन्ही अजनबियों में चैन से सारी उम्र कटे,
जिनके कारण बस्ती छोड़ी, नाम न लो उन प्यारों का

कुछ मशहूर शायरों से !

वो अगर मुझको न भूलें, तो भुलाएँ किसको
हम अगर उनको भुला दें तो किसे याद करें !

पसीना मौत का माथे पे आया, आईना लाओ
हम अपनी जिंदगी की आखिरी तस्वीर देखेंगे !

अँधेरा ही भला है, मैं इसी की क़द्र करता हूँ ,
शबे महताब में अक्सर हुई हैं चोरियां मेरी !

मंजिल पर वो क्या पहुंचेंगे, हर गाम पे धोखा खायेंगे
वो काफले वाले, जो अपने सरदार बदलते रहते हैं !

दुश्मनी जम कर करो पर, इतनी गुंजाईश रहे ,
फिर कभी जब दोस्त बन जायें तो शर्मिंदा न हो

दिल टूटने से, थोडी सी तकलीफ तो हुई ,
लेकिन तमाम उम्र का आराम मिल गया !

Sunday, June 29, 2008

१९७८ की डायरी के कुछ पन्ने !

भिन्न भिन्न शायरों के लिखे हुए ये शेर मुझे बहुत पसंद थे, स्टुडेंट लाइफ में लिखे इन शेरों पर इनके लेखक का नाम नहीं है ! क्षमा मांगते हुए उनके शेरों को यहाँ दे रहा हूँ !

"हमने जब मौसमे -बरसात से चाही तौबा
बादल इस जोर से बरसा कि इलाही तौबा !''

"है मुमकिन दुश्मनों की दुश्मनी पर सबर कर लेना
मगर यह दोस्तों की बेरुखी देखी नही जाती !"

"भुलाई नहीं जा सकेगीं ये बातें ,
बहुत याद आयेंगे हम याद रखना "

" अभी से क्यों छलक आए तुम्हारी आँख में आंसू
अभी छेडी कहाँ है दास्ताने जिंदगी हमने "

" दुश्मनों से प्यार होता जाएगा
दोस्तों को आजमाते जाइए "

" हमें कुछ काम अपने दोस्तों से आ पड़ा यानी
हमारे दोस्तों के बेवफा होने का वक्त आया "

" तेरी इस बेवफाई पर फ़िदा होती है जां मेरी
खुदा जाने अगर तुझमे वफ़ा होती तो क्या होता"