Friday, November 28, 2008

वो मेरे बच्चों को

वो मेरे बच्चों को स्कूल ले के जाता था।
और उसका बेटा वहीं खोमचा लगाता था॥

उन्हें जो धूप से, बरसात से बचाता था ।
खुद उसके सर पे फ़क़त आसमाँ का छाता था।

भटक गया हूं जहां मैं –कभी उसी वन से,
सुना तो है कि कोई रास्ता भी जाता था॥

सियाह रात थी, और आँधियाँ भी थीं; लेकिन
उन्हीं हवाओं में एक दीप टिमटिमाता था ॥

उसे पड़ोसी बहुत नापसन्द करते थे।
वो रात में भी उजालों के गीत गाता था॥

Tuesday, November 25, 2008

यादों के दीपक जलते हैं

बिम्ब उलझ कर जब संध्या में, सूरज के संग संग ढलते हैं
जाने अनजाने तब मेरी यादों के दीपक जलते हैं

सिरहाने के तकिये में जब ओस कमल की खो जाती है
राह भटक कर कोई बदली, बिस्तर की छत पर छाती है
लोरी के सुर खिडकी की चौखट के बाहर अटके रहते
और रात की ज़ुल्फ़ें काली रह रह कर बिखरा जाती हैं


तब सपने आवारा होकर अम्बर में उडते रहते है
जाने अनजाने तब मेरी यादों के दीपक जलते हैं


पनघट की सूनी देहरी पर जब न उतरती गागर कोई

राह ढूँढती इक पगडन्डी रह जाती है पथ में खोई
सुधियों की अमराई में जब कोई बौर नहीं आ पाती
बरगद की फ़ुनगी पर बैठी बुलबुल गीत नहीं जब गाती


और हथेली में किस्मत के लेखे जब बनते मिटते हैं
जाने अनजाने तब मेरी यादों के दीपक जलते हैं

इतिहासों के पन्नों में से चित्र निकल जब कोई आता
रिश्तों की कोरी चूनर से जुड जाता है कोई नाता
पुरबाई जब सावन को ले भुजपाशों में गीत सुनाये
रजनीगन्धा की खुशबू जब दबे पाँव कमरे तक आये

और क्षितिज पर घिरे कुहासे में जब इन्द्रधनुष दिखते हैं
जाने अनजाने तब मेरी यादों के दीपक जलते हैं


(२००३)

Friday, November 21, 2008

कह गया था

कह गया था, मगर नहीं आया;
वो कभी लौट कर नहीं आया।

क़ाफिले में तमाम लोग थे पर,
बस वही हमसफ़र नहीं आया।

रेल जीवन की ‘टर्मिनस’ पहुंची;
किंतु मेरा शहर नहीं आया।

ऐसा क्यों लगता है कि जैसे वो,
आ तो सकता था, पर नहीं आया।

एक मेरी बिसात क्या, सुख तो
जाने कितनों के घर नहीं आया।

Tuesday, November 18, 2008

कुछ यहाँ पर हो गया है

है नहीं बदलाव कोई, सूरतें वे ही पुरानी
पर न जाने लग रहा क्यों कुछ यहाँ पर हो गया है

चाँदनी वाले क्षितिज से
देखिये नजरें फिराकर
प्रीति के इतिहास की
गौरव कथायें गुनगुनाकर
यामिनी-गंधा सुमन की
गंध में डूबी हुई सी
एक दुल्हन सी, प्रतीक्षा
में खड़ी देखें प्रतीची

रक्तवर्णी चूनरी से झील का श्रन्गार कर के
देखिये सूरज अचानक आज फिर से खो गया है

पनघटों पर गागरों की
पंक्तियाँ अनगिन बनाकर
खेत की हर मेंड़ पर
आषाढ़ की मल्हार गाकर
चातकों की प्यास के हर
सुप्त पल को सींचता सा
धुंध में डूबे गगन में
एक रेखा खींचता सा

डाल भ्रम में सावनों के गांव का हर इक मुसाफ़िर
एक बादल का कोई टुकड़ा यहाँ फिर रो गया है

Friday, November 14, 2008

कहां गए

कहां गए वो लड़कपन के ख़्वाब, मत पूछो;
कड़ा सवाल है, इसका जवाब मत पूछो।

अकेले मेरे दुखों की कहानियां छोड़ो;
समंदरों में लहर का हिसाब मत पूछो।

मुबारकों की रवायत है कामयाबी पर,
कि कौन कैसे हुआ कामयाब, मत पूछो।

जो हर कदम पे मेरे साथ है, वो तनहाई
मेरा नसीब है या इंतख़ाब, मत पूछो।

अमावसों में चराग़ों का इंतज़ाम करो;
कहां फ़रार हुआ आफ़ताब मत पूछो।

Tuesday, November 11, 2008

अतीत के झरोखों से

कौन झंकारता तार मन के मेरे
उंगलियाँ सारी मुझको मिलीं व्यस्त ही

किस तरह गीत अपना सुनाऊँ तुम्हें
मन की वीणा के तारों में कम्पन नहीं
खुश्बूओं में डुबो शब्द बिखराये तो
किन्तु महका कहीं कोइं चन्दन नहीं
मैने कितना अलंकॄत किया शब्द को
किन्तु मिल न सका अर्थ कोइं उन्हें
हो गया व्यर्थ श्रॄंगार सारा प्रिये
छू न पाया मेरा प्रस्फुटित स्वर तुम्हें

ताकता मैं रहा नित्य प्राची मगर
सूर्य उगने से पहले हुआ अस्त ही

अर्थ को खोजते शब्द खुद खो गया
जो था शाश्वत कभी,आज नश्वर हुआ
भावनायें मेरी खटखटाती रहीं द्वार
पर हर ह्रदय आज पत्थर हुआ
देखते देखते मेरी सम्प्रेषणा
लड़ती अवरोध से छिन्न हो रह गयी
जो भी संचित थी पूँजी मेरी साँस की
आह की आँधियों में सिमट बह गयी

रोज पलकों पे अपनी सजाता रहा,
पर महल स्वप्न का हर मिला ध्वस्त ही

स्वर सभी गूँजते शंख के खो गये
आरती मन्दिरों से परे रह गयी
रास्ता भूल कर खो गइं है घटा
बात ये इक हवा पतझरी कह गइं
साँझ के दीप में शेष बाती नहीं
रोशनी क्षीण हो टिमटिमाती रही
जो न निकली किसी साज के तार से
एक आवाज़ सी सिर्फ़ आती रही

गणना तारों नक्षत्रों की जब भी करी
हर सितारा मिला राहू श्ंर ग्रस्त ही

कौन झन्कारता तार मन के मेरे
उंगलियाँ सारी मुझको मिलीं व्यस्त ही

Friday, November 7, 2008

चिड़िया के बच्चे

चिड़िया के बच्चों ने पर तौले ;
और उड़ चले।
नन्हें-नन्हें फड़फड़ाते पर
कोमल और सुकुमार.

कुछ तेज़ी से उड़े;
आगे निकले;और बनाया
एक नया नीड़;
फिर से लिखने को-
वही पुरातन चिर कथा.

कुछ के पंख
इतने सशक्त न थे.
आंधी-वर्षा से जूझते
वे जा गिरे धरती पर-
और ग्रास बने –
व्यालों बिलावों के.

कुछ करते रहे जतन ,
नीड़ के निर्माण का.
रहे खोजते कोई सशक्त डाल
छाया और आश्रय को.
कुछ को मिली;
कुछ को नहीं मिली.

सबका था अपना-अपना
जीवन-समर;
अपने-अपने नीड़,
अपनी-अपनी डाल;
अपने-अपने व्याल.

पर एक तथ्य
उन सबकी गाथा में साझा था.
उनमें से कोई भी
पुराने नीड़ पर नहीं लौटा.

Tuesday, November 4, 2008

खो गये चाँदनी रात में

चाँदनी रात के हमसफ़र खो गये चाँदनी रात में
बात करते हुए रह गये, क्या हुआ बात ही बात में

ज़िन्दगी भी तमाशाई है, हम रहे सोचते सिर्फ़ हम
देखती एक मेला रही, हाथ अपना दिये हाथ में

जिनक दावा था वो भूल कर भी न लौटेंगे इस राह पर
याद आई हमारी लगा आज फिर उनको बरसात में

जब सुबह के दिये बुझ गये, और दिन का सफ़र चुक गया
सांझ तन्हाईयां दे गई, उस लम्हे हमको सौगात में

तालिबे इल्म जो कह गये वो न आया समझ में हमें
अपनी तालीम का सिलसिला है बंधा सिर्फ़ जज़्बात में

आइने हैं शिकन दर शिकन, और टूटे मुजस्सम सभी
एक चेहरा सलामत मगर, आज तक अपने ख्यालात में

मेरे अशआर में है निहाँ जो उसे मैं भला क्या कहूँ
नींद में जाग में भी वही, है वही ज्ञात अज्ञात में

ये कलांमे सुखन का हुनर पास आके रुका ही नहीं
एक पाला हुआ है भरम, कुच हुनर है मेरे हाथ में

ख्वाहिशे-दाद तो है नहीं, दिल में हसरत मगर एक है
कर सकूँ मैं भी इरशाद कुछ एक दिन आपके साथ में

Saturday, November 1, 2008

मुद्दतों पहले

मुद्दतों पहले जहां छोड़ लड़कपन आए
बारहा याद वे दालान, वे आँगन आए।

रास्ते में किसी बरगद का तो साया न मिला;
हाँ! मगर इसमें बबूलों के कई वन आए।

घर नगर छोड़ के जिस रोज़ से वनवास लिया
हमसे मिलने कई तुलसी, कई रावन आए।

रहे गुमनाम हर इक बज़्म ओ बाज़ार में हम
जैसे नाबीना शहर में कोई दरपन आए।

कट गई उम्र यूं ही आँख मिचौनी में नदीम
दुःख के बैसाख कभी दर्द के सावन आए।