Tuesday, December 30, 2008

आपकी राह उन मोतियों से सजे

फिर नया वर्ष आकर खड़ा द्वार पर,
फिर अपेक्षित है शुभकामना मैं करूँ
मांग कर ईश से रंग आशीष के
आपके पंथ की अल्पना मे भरूँ
फिर दिवास्वप्न के फूल गुलदान में
भर रखूँ, आपकी भोर की मेज पर
न हो बाती, नहीं हो भले तेल भी,
कक्ष में दीप पर आपके मैं धरूँ

फिर ये आशा करूँ जो है विधि का लिखा
एक शुभकामना से बदलने लगे
खंडहरों सी पड़ी जो हुई ज़िन्दगी
ताजमहली इमारत में ढलने लगे
तार से वस्त्र के जो बिखरते हुए
तागे हैं, एक क्रम में बंधें वे सभी
झाड़ियों में करीलों की अटका दिवस
मोरपंखी बने और महकने लगे

गर ये संभव है तो मै हरइक कामना
जो किताबों में मिलती, पुन: कर रहा
कल्पना के क्षितिज पर उमड़ती हुई
रोशनी मे नया रंग हूँ भर रहा
आपको ज़िन्दगी का अभीप्शित मिले
आपने जिसका देखा कभी स्वप्न हो
आपकी राह उन मोतियों से सजे
भोर की दूब पर जो गगन धर रहा.

Friday, December 19, 2008

दूर का मसला

दूर का मसला घरों तक आ रहा है
बाढ़ का पानी सरों तक आ रहा है।

आग माना दूर है, लेकिन धुआं तो,
इन सुहाने मंज़रों तक आ रहा है।

लद चुके दिन चूड़ियों के,मेंहदियों के;
फावड़ा कोमल करों तक आ रहा है।

मंदिरों से हट के अब मुद्दा बहस का
जीविका के अवसरों तक आ रहा है।

इसने कुछ इतिहास से सीखा नहीं है;
एक प्यासा सागरों तक आ रहा है।

Wednesday, December 17, 2008

चित्र मावस का था, रंग भरते रहे

राहें ठोकर लगाती रहीं हर घड़ी
और हम हर कदम पर संभलते रहे
कट रही ज़िन्दगी लड़खड़ाते हुए
स्वप्न बनते संवरते बिगड़ते रहे

चाह अपनी हर इक टंग गई ताक पर
मन में वीरानगी मुस्कुराती रही
आस जो भी उगी भोर आकाश में
साँझ के साथ मातम मनाती रही
अधखुले हाथ कुछ भी पकड़ न सके
वक्त मुट्ठी से पल पल खिसकता रहा
शब्द के तार से जुड़ न पाया कभी
स्वर अधूरा गले में सिसकता रहा

कोई भी न मिला मौन जो सुन सके
सुर सभी होठ पर आ बिखरते रहे

जेठ गठजोड़ मधुबन के संग कर रहा
कोंपलें सब उमीदों की मुरझा गईं
टूट कर डाल से उड़ गये पात सी
आस्थायें हवाओं में छितरा गईं
देह चन्दन हुई, सर्प लिपटे रहे
मन के मरुथल में उगती रही प्यास भी
कल्पनाओं के सूने क्षितिज पर टंगा
पास आया न पल भर को मधुमास भी

हाथ में तूलिका बस लिये एक हम
चित्र मावस का था, रंग भरते रहे

भोर को पी गई इक किरण सूर्य की
साँझ दीपक बनी धार में बह गई
टिमटिमाते सितारों की परछाईयाँ
रात की ओढ़नी पर टँकी रह गईं
प्यास हिरना के बनकर भटकते सपन
नींद सो न सकी एक पल के लिये
अर्थ पाने की हम कोशिशें कर रहे
जो बुजुर्गों ने आशीष हमको दिये

मान्यताओं के घाटों पे काई जमी
हम कदम दर कदम बस फिसलते रहे

Friday, December 12, 2008

जब भी चाहा

जब भी चाहा तुमसे थोड़ी प्यार की बातें करूं

पास बैठूं दो घड़ी,श्रृंगार की बातें करूं।



वेदना चिरसंगिनी हठपूर्वक कहने लगी

आंसुओं की,आंसुओं की धार की बातें करूं।



देखता हूँ रुख ज़माने का तो ये कहता है मन

भूल कर आदर्श को व्यवहार की बातें करूं।



आप कहते हैं प्रगति के गीत गाओ गीतकार;

सत्य कहता है दुखी संसार की बातें करूं।



चाटुकारों के नगर में सत्य पर प्रतिबन्ध है।

किस लिए अभिव्यक्ति के अधिकार की बातें करूं।



इस किनारे प्यास है; और उस किनारे है जलन

क्यों न फिर तूफ़ान की मंझधार की बातें करूं.

Tuesday, December 9, 2008

लक्षण हैं चढ़ रही उमर के

संभल संभल जब उठते हैं पग, अमराई की राहगुजर पे
अरे रूपसि ! निश्चित मानो, लक्षण हैं चढ़ रही उमर के

धुंधली आकॄतियों के बिम्बों में मन उलझ उलझ जाता है
एक अधूरा छंद अधर पर पाहुन बन बन कर आता है
अभिलाषा की हर अँगड़ाई टूट टूट कर रह जाती है
निमिष मात्र भी एक बिन्दु पर ध्यान नहीं रुकने पाता है

हर इक सांझ लिये आती है बाँहों में सपने भर भर के
अरी वावली ! ध्यान रहे ये लक्षण हैं चढ़ रही उमर के

अनजाने ही खिंच आती हैं चेहरे पर रेखायें लाज की
गडमड होकर रह जाती हैं, बातें कल की और आज की
फूलों की पांखुर को करते, आमंत्रित पुस्तक के पन्ने
मन को करती हैं आलोड़ित ,बात रीत की औ; रिवाज की

मीठी मीठी बातें करने लगें रंग जब गुलमोहर के
सुनो रुपसि ! याद रहे, यह लक्षण हैं चढ़ रही उमर के

मन को भाने लगती हैं जब इतिहासों की प्रेम कथायें
चैती के आंगन में आकर सावन की मल्हारें गायें
पुरबाई के झोंके भर दें रोम रोम में जब शिंजिनियां
सात रंग पलकों की देहरी पर आकर अल्पना बनायें

आतुर हों जूड़े में सजने को जब फूल उतर अंबर के
रूपगर्विते ! मानो तुम ये लक्षण हैं चढ़ रही उमर के

Tuesday, December 2, 2008

अतीत के झरोखों से

मौन है स्वर, ह्रदय गूँगा, आँख में आँसू नहीं हैं
इक अपाहिज सी व्यथा का बोझ कांधे पे रखा है

ढाक के वे तीन पत्ते, जो सदा शाश्वत रहे हैं
आज फिर से सामने आये हैं मेरे खिलखिलाते
नीम की कच्ची निबोली पर मुलम्मा चाशनी का
उम्र सारी ये कटी है बस यूँही धोखे उठाते

तोड जी करते प्रयासों का, सदा उपलब्धियों के
हश्र क्या होगा किसी को ग्यात ये कब जो सका है

साँझ ढूंढे मोरपंखी बिम्ब दर्पण में निशा के
साथ चलना चाहती द्रुतगामिनी चलती हवा के
पर टिकी बैसाखियों पर एक जर्जत क्षीण काया
दो कदम भी बढ न पाती,ठोकरें खा लड्खडा के

भोर का पाथेय लेकर राह कोई सज न पाती
नीड में ही हर मुसाफ़िर हार कर बैठा थका है