Tuesday, October 20, 2009

माना मद्धम है

माना  मद्धम  है, थरथराती  है
फिर भी इक लौ तो जगमगाती है

 मैं अकेला कभी नहीं गाता
वो मेरे साथ गुनगुनाती है

हां ये सच है के कुछ दरख़्त कटे
एक बुलबुल तो फिर भी गाती है

मैं अकेला कहां मेरे मन में 
एक तस्वीर मुस्कराती है

आँख कितनी ही मूंद ले कोई
ज़िन्दगी आइना दिखाती है

Thursday, August 13, 2009

सबको मालूम थे

सबको मालूम थे हमसे भी भुलाए न गए
वे कथानक जो कभी तुमको सुनाये न गए 

गीत लिखते रहे जीवन में अंधेरों के खिलाफ़
और दो-चार दिये तुमसे जलाए न गए
 
दूर से ही सुनीं वेदों की ऋचाएं अक्सर
यज्ञ में तो कभी शम्बूक बुलाए न गए 

यूकेलिप्टस के दरख्तों में न छाया न नमी
बरगद-ओ-नीम कभी तुमसे लगाए न गए

इसी बस्ती में सुदामा भी किशन भी हैं नदीम
ये अलग बात है मिलने कभी आये न गए

Saturday, August 1, 2009

डा० अमर ज्योति--जन्म दिन शुभ हो

पीर के अश्रुओं से भरी लेखनी, शब्द को जन्म दे, खिलखिलाती रहे
राह की धूल यमुना की रेती बनी, आपके भाल टीका लगाती रहे
चार दिन छह दहाई शती त्रय दिवस,आज का ही निरंतर करें अनुसरण
भोर आ नज़्म की वीथिका में किरण, से गज़ल का कलेवर सजाती रहे

सादर शुभकामनाओं सहित


राकेश

Friday, July 24, 2009

जी हम भी कविता करते हैं

मान्य महोदय हमें बुलायें सम्मेलन में हम भी कवि हैं
हर महफ़िल में जकर कविता खुले कंठ गाया करते हैं
हमने हर छुटकुला उठा कर अक्सर उसकी टाँगें तोड़ीं
और सभ्य भाषा की जितनी थीं सीमायें, सारी छोड़ी
पहले तो द्विअर्थी शब्दों से हम काम चला लेते थे
बातें साफ़ किन्तु अब कहते , शर्म हया की पूँछ मरोड़ी
हमने सरगम सीखी है वैशाखनन्दनों के गायन से
बड़े गर्व से बात सभी को हम यह बतलाया करते हैं
अभियंता हम, इसीलिये शब्दों से अटकलपच्ची करते
हम वकवास छाप कर अपनी कविता कह कर एंठा करते
देह यष्टि के गिरि श्रंगों को हमने विषय वस्तु माना है
केवल उनकी चर्चा अपनी तथाकथित कविता में करते
एक बार दें माईक हमको, फिर देखें हम हटें न पीछे
शब्द हमारे होठों से पतझर के पत्तों से झरते हैं
महाकवि हम, हम दिन में दस खंड-काव्य भी लिख सकते हैं
जो करते हैं वाह, वही तो अपने मित्र हुआ करते हैं
जो न बजा पाता है ताली, वो मूरख है अज्ञानी है
उसे काव्य की समझ नहीं ये साफ़ साफ़ हम कह सकते हैं
सारे आयोजक माने हैं हम सचमुच ही लौह-कवि हैं
इसीलिये आमंत्रित हमको करने में अक्सर डरते हैं
जो सम्मेलन बिना हमारे होता, उसमें जान न होती
हमको सुनकर सब हँसते हैं, बाकी को सुन जनता रोती
हुए हमारे जो अनुगामी, वे मंचों पर पूजे जाते
हम वसूलते संयोजक से, न आने की सदा फ़िरौती
नीरज, सोम, कुँअर, भारत हों, हसुं चाहे गुलज़ार, व्यास या
ये सब एक हमारी कविता के आगे पानी भरते हैं
हम दरबारी हैं तिकड़म से सारा काम कराते अपना
मौके पड़ते ही हर इक के आगे शीश झुकाते अपना
कुत्तों से सीखा है हमने पीछे फ़िरना पूँछ हिलाते
और गधे को भी हम अक्सर बाप बना लेते हैं अपना
भाषा की बैसाखी लेकर चलते हैं हम सीना ताने
जिस थाली में खाते हैं हम, छेद उसी में ही करते हैं
जी हम भी कविता करते हैं

Friday, April 17, 2009

मेरे भोले सिसकते मन

मेरे भोले सिसकते मन! मेरे कातर करुण क्रंदन!
रोओ ; चुप भी हो जाओ;
चलो चुपचाप सो जाओ।
बढ़ीं इतनी निराशाएं , कि जीवन भार लगता है;
बहुत उलझा हुआ इस विश्व का व्यापार लगता है।
जनाज़ों के शहर में ज़िंदगी को कौन पूछेगा?
मुखौटों के नगर में आदमी को कौन पूछेगा??
यही है रास्ता बेहतर, कि सर तक ओढ़ कर चादर,
मधुर सपनों में खो जाओ।
चलो चुपचाप सो जाओ।
ये माना जानलेवा ये जिगर का दर्द है अपना;
ये क्या कम है ज़माने में कोई हमदर्द है अपना।
अगर रोना पड़ा ही तो -अकेले तो न रोयेंगे;
सफ़र में खो गये भी तो, अकेले तो न खोयेंगे।
किसी का हाथ होगा ही, कोई तो साथ होगा ही,
चलो फ़िर क्या है खो जाओ;
चलो, चुपचाप सो जाओ।
बहुत चाहा कि इस रूठे ज़माने को मना लूं मैं;
बिगड़ती बात जैसे हो सके वैसे बना लूँ मैं।
मगर मतलब की दुनिया प्यार का व्यवहार क्या समझे!
मेरे अरमान क्या हैं - अजनबी संसार क्या समझे!!
बहुत बेफिक्र रहता हूँ; सभी से अब तो कहता हूँ-
ख़फा होते हो; हो जाओ ।
चलो चुपचाप सो जाओ।

Tuesday, April 14, 2009

मैं इक और गीत रच डालूँ

बुझे बुझे सरगम के सुर हैं
थके थके सारे नूपुर हैं
शब्दों का पिट गको आतुर है
भावों की लुट हई पोटली अनुभूति के कोष रिक्त हैं
और तकाजा एक तुम्हारा मैं इक नया गीत लिख डालूँ

अक्षर अक्षर बिखर गई हैं
गाथाय्रं कुब याद नहीं हैं
शीरीं तो हैं बहुत एक भी
लेकिन पर फ़रहाद नहीं है
बाजीराव नहीं मिल पाया
थकी ढूँढते है मस्तानी
इतिहासों की प्रेम कथायें
किसने समझी किसने जानी
राजमुकुट के प्रत्याशी तो खडे हुए हैं पंक्ति बनाकर
तुम्ही बताओ सिंहासन पर मैं इनमें से किसे बिठा लूँ

महके हुए फूल उपवन से
रह रह कर आवाज़ लगाते
मल्हारों के रथ पनघट पर
रूक जायेंगे आते जाते
फागुन के बासन्ती रंग में
छुपी हुईं पतझडी हवायें
बार बार अपनी ही धुन में
एक पुरानी कथा सुनायें

माना है अनजान डगरिया, लेकिन दिशाचिन्ह अनगिनती
असमंजस में पडा हुआ हूँ, किसको छोडूँ किसे उठा लूँ

अलगोजे तो नहीं छेड़ता
गूँज रहा कोई बाऊल स्वर
रह जाता घुल कर सितार में
सरगम के स्रोतों का निर्झर
लग जाते हैं अब शब्दों पर
पहरे नये, व्याकरण वाले
छन्द संवरता तो होठों पर
लेकिन रहता है डर डर कर

गज़ल नज़्म मुक्तक रुबाईयां, सब ही मुझसे संबोद्जित हैं
तुम बोलो इनमें से किसको अभिव्यक्ति का सिला बना लूँ

और तुम्हारा एक तकाजा, मैं इक और गीत रच डालूँ
मैं इक और गीत रच डालूँ

Friday, March 20, 2009

गीत


पी के देखा हर नशा हर विष पिया,
किंतु फ़िर भी वेदना सोई नहीं।


घर से निकले थे बड़ी उम्मीद से

सब समस्याओं का हल मिल जायेगा.
इस मरुस्थल की नहीं सीमा तो क्या,
इस मरुस्थल में ही जल मिल जायेगा।


प्यास तन-मन की मगर ऐसी बढ़ी,
दिल दुखा तो आँख तक रोई नहीं।

वास्तविकताएँ चुभीं कुछ इस तरह
जग गए हम और सपने सो गए.
घिर गए कुछ यूं अपरिचित भीड़ में,
सारे परिचित,सारे अपने खो गए।

मुड़ के देखा भी कभी तो दूर तक,
वापसी का रास्ता कोई नहीं।

आज तक तो
जैसे-तैसे काट ली,
कल कहाँ जायेंगे कुछ भी तय नहीं.
दोपहर की रोटियाँ तो जुट गईं
शाम क्या खाएंगे कुछ भी तय नहीं।


जिंदगी के अनवरत संघर्ष में,
कौन सी निधि है कि जो खोई नहीं.

Tuesday, March 17, 2009

नाले याद आते हैं

बहाईं थीं जहां फ़ाकिर ने कागज़ की कभी कश्ती
कि जिसके साहिलों पर मजनुऒं की बस्तियां बसतीं
जहां हसरत तमन्ना के गले को घोंट देती थी
लगा कर लोट जिसमें भेंस दिन भर थी पड़ी हँसती
हरे वो रंग पानी के औ: काले याद आते हैं
तुम्हारे शहर के वो गन्दे नाले याद आते हैं

नहीं मालूम था हमको मुहब्बत जब करी हमने
कि माशूका की गलियों में लुटेंगे इस कदर सपने
जो उसके भाईयों ने एक दिन रख कर हमें कांधे
किया मज़बूर उसमें था सुअर के साथ मिल रहने
हमें माशूक के वो छह जियाले याद आते हैं
तुम्हारे शहर के वो गंदे नाले याद आते हैं

कहां है गंध वैसी, सड़ चुकी जो मछलियों वाली
जहां पर देख हीरों को बजी फ़रहाद की ताली
जहां तन्हाईयों में इश्क का बेला महकता था
जहां पर रक्स करती थी समूचे गांव की साली
अभी तक झुटपुटों के वे उजाले याद आते हैं
तुम्हारे गांव के वे ग्म्दे नाले याद आते हैं

किनारे टीन टप्पड़ का सिनेमाहाल इकलौता
जहां हीरो किया करता था हीरोइन से समझौता
जहां पर सीख पाये थे बजाना सीटियां हम सब
जहां उड़ता रहा था मालिकों के हाथ का तोता
हमें उनके निकलते वे दिवाले याद आते हैं
तुम्हारे शहर के वे गंदे नाले याद आते हैं

जहां पर एक दिन फ़रहाद ने शीरीं को छेड़ा था
निगाहे नाज की खातिर किया लम्बा बखेड़ा था
कहां पर चार कद्दावर जवानों ने उठा डंडा
मियां फ़रहाद की बखिया की तुरपन को उधेड़ा था
हमें फ़रहाद के अरमाँ निकाले याद आते हैं
तुम्हारे शहर के वे गंदे नाले याद आते हैं

Friday, March 6, 2009

कुछ यूं ही

छंद के बंद आते नहीं हैं मुझे, इसलिये एक कविता नहीं लिख सका
लोग कहते रहे गीत शिल्पी मुझे, शिल्प लेकिन नयाएक रच न सका
फिर भी संतोष है तार-झंकार से जो उमड़ती हुई है बही रागिनी
शब्द की एक नौका बहाते हुए,साथ कुछ दूर तक मैं उसे दे सका

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बोझ उसका है कांधे पे भारी बहुत, जो धरोहर हमें दी है वरदाई ने
और रसखान की वह अमानत जिसे, बांसुरी में पिरोया था कन्हाई ने
हमको खुसरो के पगचिन्ह का अनुसरण नित्य करना है इतना पता है हमें
और लिखने हैं फिर से वही गीत कुछ, जिनको सावन में गाया है पुरवाई ने

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लेखनी किन्तु अक्षम हुई है लगा शब्द से जोड़ पाती है नाता नहीं
मन पखेरु चला आज फिर उड़ कहीं, गीत कोई मगर गुनगुनाता नहीं
जो न संप्रेष्य होता स्वरों से कभी भाव, अभिव्यक्तियों के लिये प्रश्न है
भावनाओं का निर्झर उमड़ता तो है, धमनियों में मगर झनझनाता नहीं

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कांपते हैं अधर, थरथराती नजर, कंठ में कुछ अटकता हुआ सा लगे
और सीने की गहराईयों में कोई दर्द सहसा उमड़त हुआ सा लगे
चीन्ह पाने की असफ़ल हुईं कोशिशें, कोई रिश्ता नहीं अक्षरों से जुड़े
मात्रा की छुड़ा उंगलियां चल दिया,शब्द मेरा भटकता हुआ सा लगे

Friday, February 27, 2009

बस में बैठे

बस में बैठे बैठे आंखें भर आना।
याद आज तक है वो तेरा शहर जाना।

कभी समन्दर की तूफ़ानों की बातें;
और कभी हल्की बारिश से डर जाना॥

बाग़ कट चुके,खेतों में सड़कें दौड़ीं;
कैसा गाँव कहां छुट्टी में घर जाना॥

किसने लिख दी जीवन की ये परिभाषा!
ज़िन्दा रहने की कोशिश में मर जाना॥

कितना कठिन सफ़र होता है,पूछो मत,
शाम ढले बेरोज़गार का घर जाना।

Friday, February 13, 2009

सारे छंद बिखर जाते हैं

नाम काव्य का लेकर जब जब
होते हैं भाषण, लफ़्फ़ाज़ी
अखबारी कतरन या कविता
में दिखता न फ़र्क जरा भी
और प्रशंसा के अफ़साने
जहाँ अपेक्षित बन जाते हैं
मित्र ! वहाँ कविता क्या होती ?
सारे छंद बिखर जाते हैं

इधर उधर की जोड़-तोड़ की
पैबंदों वाली रचनायें
क्या क्या पढ़ लें, क्या क्या सुन लें
किसको गायें, किसे सुनायें
आईने की बिखरी किरचों
में प्रतिबिम्ब छले जाते हैं
मित्र! नहीं कविता हो पाती
सारे छंद बिखर जाते हैं

अपने दर्पण में जब अपनी,
ही तस्वीर नजर आती है
और दृष्टि की सीम अपने
दरवाजे तक रह जाती है
शब्द-कोष में अर्थ क्षितिज के
अपने माफ़िक बन जाते हैं
तब न सही हो पाती कविता
सारे छंद बिखर जाते हैं

अपने अपने राग अलापें
सब अपनी अपनी ढपली पर
छोर छोर पर चित्रित होता
अपना हे फैला आडम्बर
और प्रशंसित और प्रशंसक
पूरक बन कर रह जाते हैं
वहाँ न कविता हो पाती है
सारे छंद बिखर जाते हैं

Friday, January 30, 2009

दुम हिलाना

दुम हिलाना
कोई मुहावरा नहीं है।
न ही मजबूरी;
कृतज्ञता?
हरगिज़ नहीं!
वह है -

एक मानसिकता
जो कुत्ते के दांतों पर हावी है।

Tuesday, January 27, 2009

मेरे अधरों पर हस्ताक्षर

मेरे अधरों पर हस्ताक्षर

प्रिये अधर से तुमने अपने जब से किये अधर पर मेरे
हस्ताक्षर, तब से सपनों की बगिया और निखर आई है

आतुर हुई कामना भर ले यष्टि कमल को भुजपाशों में
आकाँक्षायें हैं सांसों की घुलें महक वाली सांसों में
नयनों की पुतली बन रांझा,चित्र हीर के बना रही है
नये रंग में नये रूप के मिले न जैसे इतिहासों में

देह तुम्हारी छूकर आई पुरबाई ने जब से आकर
मुझे छुआ है लगा धरा पर अलकापुरी उतर आई है

लगी जागने भोर रूप की उजली धूप बाँह में लेकर
निशा संवरने लगी घटाओं से लहराते कुन्तल छूकर
नींदों वाली डोर थाम कर लगे झूलने झूला तारे
महकीं डगर, और अलगोजे लगे गूँजने चहुंदिशि भू पर

द्वार तुम्हारे से आ मलयज मेरी गलियों से जब गुजरी
मुझको लगा तुम्हारे नूतन संदेसे लेकर आई है

हुए तिरोहित एक निमिष में मन के मेरे संशय सारे
रातों में आ लगे जलाने दीपक पूनम के उजियारे
नदिया की लहरों सी पल पल लगीं उमड़ने मधुर उमंगें
एक तुम्हारी छवि रहती है बस नजरों में सांझ सकारे

स्वर से उपजी सरगम ने आ जब से छुआ गीत इक मेरा
लगा मुझे मेरे शब्दों में वीणा स्वयं उतर आई है

Friday, January 9, 2009

टूटे यूं संबंध सत्य से

टूटे यूं संबंध सत्य से सभी झूठ स्वीकार हो गये।
ठोकर खाते-खाते आख़िर हम भी दुनियादार हो गये॥

बचपन से सुनते आये थे
सच को आंच नहीं आती है।
पर अब देखा-सच बोलें तो,
दुनिया दुश्मन हो जाती है॥

सत्यम वद, धर्मम चर के उपदेश सभी बेकार हो गये।
ठोकर खाते-खाते………….

खण्डित हुई सभी प्रतिमाएं;
अब तक जिन्हें पूजते आए।
जिस हमाम में सब नंगे हों,
कौन भला किससे शरमाए?

बेचा सिर्फ़ ज़मीर और सुख-स्वप्न सभी साकार हो गये।
ठोकर खाते-खाते…………….

गिद्धों के गिरोह में जबसे
हमने अपना नाम लिखाया।
लोग मरे दुर्भिक्षों में पर,
हमने सदा पेट भर खाया॥

कितने दिन नाक़ारा रहते;हम भी इज़्ज़तदार हो गये।
ठोकर खाते-खाते…………….

Tuesday, January 6, 2009

प्रिन्टर ने इन्कार कर दिया

कवि सम्मेलन की खातिर , ये सोचा कविता चार छाप लूँ
लेकिन प्रिन्टर ने कवितायें देने से इन्कार कर दिया

तकनीकी के साथ चले हम, इसीलिये की विदा डायरी
कम्पूटर पर संजो रखी है, हमने अपनी सकल शायरी
जहां कहीं भी जाते अपनी पेन-ड्राइव को ले जाते हैं
वहीं छाप कत अपनी कविता, सम्मेलन में जा गाते हैं

हम निर्भर हैं इन यंत्रों पर, ये हमने इज़हार कर दिया
इसीलिये प्रिन्टर ने कविता देने से इन्कार कर दिया

बोला, मेरी है कविता में जो तुम कहते एक कहानी
नहीं चाहता मैं दोबारा फिर से जाये कहीं बखानी
बहुत रो चुका काले आंसू, अब तक तुमसे इंगित लेकर
लेकिन आज कोष रीता है, कुछ न मिला वापिस, दे दे कर

जितने भी ट्रे में थे कागज़ एक एक को फाड़ रख दिया
और एक भी कविता मुझको देने से इन्कार कर दिया

बूट किया मैने तो उसने पॄष्ठ चार छह वापिस उगले
लेकिन उनमें अंकित थे कुछ धब्बे कुछ स्याही के गुठले
आटो और मैनुअल फ़ीडें, सब तकनीकें अजमा हारे
इसीलिये अब कविता के बिन आये हैं हम यहां बिचारे

जो प्लान था आज सुनाने का, वो बंटाढार कर दिया
क्योंकि मुझे प्रिन्टर ने कविता देने से इन्कार कर दिया

Saturday, January 3, 2009

उसने कभी भी

उसने कभी भी पीर पराई सुनी नहीं .
कितना भला किया कि बुराई सुनी नहीं.

रोटी के जमा-ख़र्च में ही उम्र कट गई,
हमने कभी ग़ज़ल या रुबाई सुनी नहीं .

औरों की तरह तुमने भी इलज़ाम ही दिये;
तुमने भी मेरी कोई सफाई सुनी नहीं.

बच्चों की नर्सरी के खिलौने तो सुन लिए;
ढाबे में बर्तनों की धुलाई सुनी नहीं.

मावस की घनी रात का हर झूठ रट लिया;
सूरज की तरह साफ सचाई सुनी नहीं.