Friday, February 27, 2009

बस में बैठे

बस में बैठे बैठे आंखें भर आना।
याद आज तक है वो तेरा शहर जाना।

कभी समन्दर की तूफ़ानों की बातें;
और कभी हल्की बारिश से डर जाना॥

बाग़ कट चुके,खेतों में सड़कें दौड़ीं;
कैसा गाँव कहां छुट्टी में घर जाना॥

किसने लिख दी जीवन की ये परिभाषा!
ज़िन्दा रहने की कोशिश में मर जाना॥

कितना कठिन सफ़र होता है,पूछो मत,
शाम ढले बेरोज़गार का घर जाना।

Friday, February 13, 2009

सारे छंद बिखर जाते हैं

नाम काव्य का लेकर जब जब
होते हैं भाषण, लफ़्फ़ाज़ी
अखबारी कतरन या कविता
में दिखता न फ़र्क जरा भी
और प्रशंसा के अफ़साने
जहाँ अपेक्षित बन जाते हैं
मित्र ! वहाँ कविता क्या होती ?
सारे छंद बिखर जाते हैं

इधर उधर की जोड़-तोड़ की
पैबंदों वाली रचनायें
क्या क्या पढ़ लें, क्या क्या सुन लें
किसको गायें, किसे सुनायें
आईने की बिखरी किरचों
में प्रतिबिम्ब छले जाते हैं
मित्र! नहीं कविता हो पाती
सारे छंद बिखर जाते हैं

अपने दर्पण में जब अपनी,
ही तस्वीर नजर आती है
और दृष्टि की सीम अपने
दरवाजे तक रह जाती है
शब्द-कोष में अर्थ क्षितिज के
अपने माफ़िक बन जाते हैं
तब न सही हो पाती कविता
सारे छंद बिखर जाते हैं

अपने अपने राग अलापें
सब अपनी अपनी ढपली पर
छोर छोर पर चित्रित होता
अपना हे फैला आडम्बर
और प्रशंसित और प्रशंसक
पूरक बन कर रह जाते हैं
वहाँ न कविता हो पाती है
सारे छंद बिखर जाते हैं